हसरतें ख़त्म हो गयीं हैं जनाब , मौसम अब अच्छा नहीं लगता
मरने से तो अब भी डरते हैं , पर जीना कुछ अच्छा सा नहीं लगता||
काफिला जैसे कहीं रुक सा गया हो ,
मंजिल ने निशान बदल सा दिया हो ,
रात में चाँद की चांदनी तो बहोत है ,
पर यह चेहरा कुछ अपना सा नहीं लगता ||
मरने से तो अब भी डरते हैं ,
पर जीना कुछ अच्छा सा नहीं लगता |
चलते-चलते इतनी दूर आ गया हूँ ,
की लौटने का रास्ता भूल सा गया हूँ ,
अपनी कदमताल से दुनिया जीती है हमने ,
पर साथ तुम्हारा अब सच्चा सा नहीं लगता ||
मरने से तो अब भी डरते हैं ,
पर जीना कुछ अच्छा सा नहीं लगता |
मुरुस्थल की आंधी में सब धुन्धिया सा गया है ,
सपनों का महल भी कहीं दिख नहीं रहा है ,
विश्वास है, इस भंवर के दहर जाने का,
पर इस तनहा सफ़र में क्यों कोई तुम सा नहीं लगता ||
मरने से तो अब भी डरते हैं ,
पर जीना कुछ अच्छा सा नहीं लगता |
हसरतें ख़त्म हो गयीं हैं जनाब , मौसम अब अच्छा नहीं लगता
मरने से तो अब भी डरते हैं , पर जीना कुछ अच्छा सा नहीं लगता ||
रुपानी शर्मा ( 18th april 2011 )
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